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  • मनोजजी शोभावत   28 January 2018 9:22 AM

    श्री नाकोडा पार्श्वनाथजी भगवान की स्थापना एवं नाकोड़ा भैरवदेव की स्थापना और माह सुद तेरस का महत्व

    ||श्री नाकोड़ा पार्श्वनाथाय नम:||
    ||श्री नाकोड़ा भैरवदेवाय नम:||

     

    इतिहास के झरोखें से....
    जन जन की चेतना के केन्द्र श्री नाकोड़ा पार्श्वभैरव देव
    चमत्कारी हाजरा हजूर नाकोड़ा भैरवदेव

    जीहां मैं बात कर रही हूँ नाकोड़ा जी तीर्थ और वहाँ बिराजते चमत्कारी नाकोड़ा पार्श्वभैरव देव की जो जन जन की आस्था का केन्द्र बिन्दू है जिसकी प्रसिद्धि इन फिजाओं और देश विदेश में फैली है।हर वर्ष जहाँ  लाखों भक्त दर्शनार्थ पधारते है पूनम भरने आते है।
    कहते है जो तारे वो तिर्थ वह भूमि कभी बहुत ही सौभाग्यशाली हो उठती है, जो तीर्थ स्थल बन जाती है । जहाँ जाने पर एक पवित्र भाव आने वाले के ह्रदय में सहज पैदा हो जाता है । श्रद्धा और आस्था से मन भर जाता है, 

    तीर्थ, धर्म से कम, आस्था से अधिक संचालित होता है, इसलिए तीर्थों के प्रति सभी धर्मों के लोग श्रधा भाव से जुड़ते चले आ रहे है । तीर्थ संस्कृत भाषा का शब्द है । आचार्य हेमचंद्रजी ने इसकी व्युत्पति करते हुए लिखा है - "तिर्यते संसार समुद्रोनेनेति" तीर्थ प्रवचनाधारश्तुर्विधः संघः । अर्थार्थ जिसके द्वारा संसार समुद्र को तैर कर पार किया जाय, वह तिर्थ।
     
    जैन परंपरा में भी तीर्थ के दो रूप माने गए है - जंगमतीर्थ और स्थावर तीर्थ ।
    स्थावर तीर्थ के भी दो रूप माने गए है - एक सिद्ध तीर्थ (कल्याण भूमि) और - दूसरा चमत्कारी या अतिशय तीर्थ । सिद्ध तीर्थ में वे स्थान माने जाते है, जहा किसी न किसी महापुरुष के जन्मादिक कल्याणक हुए हों, वे सिद्ध, बुद्ध ओर मुक्त हुए हो अथवा उन्होंने विचरण किया हो । उन स्थानों पे उनकी स्मृति स्वरुप वहॉ मंदिर, स्तूप, मूर्तियाँ स्थापित की गई हों । ऐसे स्थानों पे सिद्वाचल, गिरनार, पावापुरी, राजगृह, चम्पापुरी और सम्मेत शिखर आदि मैं जाते है । 

    चमत्कारी तीर्थ वे क्षेत्र माने जाते है, जहां कोई भी महापुरुष सिद्ध तो नहीं हुये है, किन्तु उस क्षेत्र में स्थापित उन महापुरषों / तीर्थकरों की मूर्तियों अतिशय चमत्कार पूर्ण होती है, और उस क्षेत्र के मंदिर बड़े विशाल, भव्य एवं कलापूर्ण होते है । ऐसे स्थानों में आबू, रणकपुर, जैसलमेर, नाकोडा, फलौदी, तारंगा, शंखेश्वर आदि माने जाते है ।

    आज हम बात कर रहें है नाकोड़ाजी तीर्थ की जिसकी प्रसिद्धि  दिन दुनी रात चौगुनी बढती जा रहीं  है इसका सबसे बड़ा कारण श्री नाकोड़ा भैरुदादा के प्रति जन मानस की आस्था और प्रत्यक्ष: सिद्ध  होते चमत्कार है

    महाभारत काल यानि नेमिनाथ जी प्रभु के समय भी नाकोड़ा जी तीर्थ का उल्लेख मिलता है।कितु आधारभूत ऐतिहासिक प्रमाण से इसकी प्राचीनता वि.स.200-300 वर्ष पूल्व यानि 2200-2300वर्ष पूर्व की मानी जा सकती है।

    भैरव देव का मूल स्वरुप
    भैरव एक अवतार हैं।उनका अवतरण हुआ था।वे भगवान शंकर के अवतार हैं। भैरव देव के दो रूप - 1) काला भैरव या काल भैरव (उनके रंग के कारण नाम काला भैरव पड़ा)।जिसने काल को जीत लिया वो काल भैरव हैं।आधी रात के बाद काल भैरव की पूजा-अर्चना की जाती है। श्री काल भैरव का नाम सुनते ही बहुत से लोग भयभीत हो जाते है और कहते है कि ये उग्र देवता है। लेकिन यह मात्र उनका भ्रम है। प्रत्येक देवता सात्विक, राजस और तामस स्वरूप वाले होते है, किंतु ये स्वरूप उनके द्वारा भक्त के कार्यों की सिद्धि के लिए ही धारण किये जाते है। श्री कालभैरव इतने कृपालु एवं भक्तवत्सल है कि सामान्य स्मरण एवं स्तुति से ही प्रसन्न होकर भक्त के संकटों का तत्काल निवारण कर देते है। 
    हिन्दू देवी देवताओं में सिर्फ ऐसे दो देव माने जाते हैं जिनकी शक्ति का सामना कोई नहीं कर सकता । एक माँ काली और दूसरा भैरव देव।इसीलिए इनकी शक्ति साधना में प्रथम स्थान है।माँ काली के क्रोध को रोकने के लिए भगवान शिव ने बालक रूप धारण कर लिया था जो बटुक भैरव कहलाया और जो काल भैरव के बचपन का रूप माना जाता है। बटुक भैरव को काली पुत्र इसलिए कहा जाता है क्यूँकी ये शिव का रूप हैं और इन्होंने काली में ममता को जगाया था। काल भैरव के मुकाबले ये छोटे बच्चे हैं।इसीलिए इनमें ममत्व है जो माफ़ कर देते हैं लेकिन उग्र रूप के कारण ये रुष्ट बहुत जल्दी होते हैं। काल भैरव अकेले शांति में रहना पसंद करते हैं, बटुक भैरव भीड़ में।दोनों की भक्ति साधना बहुत जल्द फलदायी होती है। ये अतिवेगवान देव हैं।ये भक्ति के भूखे हैं।बटुक भैरव को ही गोरा भैरव कहा जाता है।

    नाकोड़ा तीर्थ में विराजित भैरव
    विक्रम संवत1502 में भावगच्छ के आचार्य श्री किर्तिरत्न सूरिजी के शुभ हस्ते श्री नाकोडा पार्श्वनाथ प्रभु की श्यामवर्णी मनोहर मोहक प्रतिमाजी की पुनः प्रतिष्ठा की थी। और नाकोड़ा भैरवजी की पिंड स्वरूप में मन्दिर के बहार स्थापना की थी ।श्री भैरुदेव के  (क्षेत्रपाल) रूप  में पूजा जाता है।जो वर्तमान में हनुमानजी की प्रतिमाजी है। विक्रम संवत महासूद तेरस  1992 मूल मन्दिर में पीले पाषण की महान विलक्षण प्रतिमा स्थापना (गुरुदेव श्री हिमाचलसुरीजी) के द्वारा की गयी जिसका विस्तृत वर्णन नीचे  दिया गया है, जिसे श्रीे नाकोड़ा भैरुदेव कहा जाता हैं। समीप ही विक्रम संवत 2007 श्री नाकोडा बाँध पर भैरव के दूसरे रूप की प्रतिमा भी स्थापित है, जिसे काला भैरव के नाम से जाना जाता है।

    श्री नाकोड़ा जी तिर्थ ने अनेक बार उत्थान और पतन को आत्मसात किया।कई बार जिर्णोद्धार हुए और कहे तो कहीं ना कहीं तीर्थ की किर्ती मे कमी आयी थी। तीर्थ सुनसान हो गया था।

    लेकिन संवत1959-60में  साध्वी प्रवर्तनि श्री सुन्दरश्रीजी म.सा. ने इस तीर्थ  के पुनरोद्धार का कार्य आरंभ किया और उनके गुरू भ्राता आचार्य श्री हिमाचलसूरीजी उनके साथ जुड़े और उनके अथक प्रयासों के परिणाम स्वरूप तिर्थ का उद्दार संभव हुआ।

    प.पूज्य गुरूदेव हिमाचल सुरीश्वरजी म.सा.तीर्थ के विकास एवं देखभाल की व्यवस्था  में  जुटे थे। एक दिन रात्रि के समय अपने उपाश्रय मे पाट पर सो रहे थे। सुबह ब्राह्ममुहूर्त मे एक छोटा सा बालक घूमता हुआ दिखाई  दिया।गुरूदेव ने बालक को बुलाया और पूछा- "अरे बालक यहाँ क्यों घूमते हो ?और किसका है तू? उसी वक्त  बालक बोला"मै यहाँ का क्षेत्रवासी (क्षेत्रपाल) रक्षकदेव हूँ ।आप महान आचार्य है।आप इस तिर्थ का विकास करें।मै आपके साथ हूँ परंतु मुझे भ.पार्श्वनाथ जी के मंदिर मे एक आले मे विराजमान करो। ऐसा बोलकर बालक अदृश्य हो गए।गुरूदेव विचार में पड़ गए ।परमात्मा के मंदिर में भैरवजी को कैसे बिठाया जाए? क्यूँ कि भैरवजी को सिन्दूर,बलि मदिरा आदि सब चढ़ते है।जैन मंदिर में यह सारी चीजों की बिलकुल अनुमति नहीं  है।
    गुरूदेव दुविधा में पड़ गए कि क्या करना?

    फिर एक दिन भैरव को जागृत करने के लिए साधना में बैठ गए ।साधना पूर्ण होने पर भैरव देव प्रत्यक्ष प्रकट हुए और कहा"बोलो गुरूदेव? गुरू देव ने कहा"आपको हम मंदिर मे विराजमान करेंगे परंतु हमारे जैन धर्म के नियमो में प्रतिबद्ध होना पड़ेगा।तब भैरव देव बोले"ठिक है जो भी आप नियम बतायेंगे वो मै स्वीकार करूँगा ।"गुरूदेव बोले"आपको जो अभी वस्तुएँ भोग रूप में चढ़ती है वो सब बंद होगी आपको हम भोग रूप में मेवा,मिठाई कलाकंद तेल आदि चढाएंगे।आपको जनेऊ धारण करनी पड़ेगी ।विधि विधान के साथ समकित धारण करवाकर आपको ब्राह्मण रूप दिया जाएगा।
    भैरवदेव बोले मेरा रूप बनाओ"आपका रूप कैसे बनायें?तब भैरवदेव ने कहा कि जैसलमेर से पीला पत्थर मंगवाकर कमर तक धड़ बनाओ फिर गुरूदेव ने मुनीमजी भीमाजी को जैसलमेर भेजा और वहाँ से पीला पत्थर मँगवाया।पत्थर भीबहुतअच्छा निकला ।फिर सोमपुरा मूर्तिकार को मूर्ति का स्वरूप बताया। पिंडाकार स्वरूप को मुँह का स्वरूप देकर मुँह और धड़ को जोड़ा और अति सुंदर मोहनीय भैरूजी की मूर्ति बनायी।नयनाभिरम्य मूर्ति को देखकर सब खुश हो गये .
     फिर मेवाड केसरी परम् पूज्य आचार्य श्री हिमाचलसुरीश्वरजी महाराज साहेब के वरहस्त से महासुद तेरस पुष्पयोग में वि. सवंत 1992 में शुभ घड़ी मे  काया स्वरूप मे (मूर्ति) की स्थापना पार्श्व नाथ प्रभु के मूल गम्भारे के बाहर गोखले में की गयी। भैरवजी का स्थान खाली ना रहे इसलिए हनुमानजी की मूर्ति स्थापित की इस  प्रकार नाकोड़ा  तीर्थ  के मूल गम्भारे मे बटुक भैरव (बाल स्वरूप) मे विराजमान हैऔर यही प्रतिष्ठा का दिन आज नाकोड़ाजी तिर्थ में  स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है। धीरे धीरे श्री नाकोड़ा जी तिर्थ जन जन की चेतना और आस्था का एक बहुत बड़ा केन्द्र बन कर उभरा है।

    नाकोड़ा भैरव देव हाजरा हजूर देव है भक्ति की शक्ति से तुरंत  ही रिझते है। तुरंत फलदायी नाकोड़ा भैरवदेव है। जो भक्तों  के बुलाने पर साक्षात हाजिर होते है।

      कहते है मुंबई में इमरजेंसी के समय 1975 की बात है
    (6 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महिने की अवधि में भारत में आपात काल घोषित था)सरकार की तरफ से एक अध्यादेश जारी हुआ था कि सोने के दुकानो वालों ने जितना भी सोना -चाँदी  गिरवी रखा है वो बिना रूपया लिए वापस करना है एक प्रकार से मानो विपदा ही आन पडी थी।

    ऐसे में उस समय बहुत से ज्वेलर्स मुम्बई के (मारवाड़, गोडवाड़, मेवाड़) वालों ने मिलकर श्री पार्श्व भैरव भक्ति करने की भावना प्रकट की थी।

     सबके प्ररेणादायक पंडित श्रीमान सोहनलालजी शास्त्री (रामसीन) गोरेगांव, मुम्बई, श्रीमान मोतीलालजी रतनचंदजी रांका सादड़ी ,गोरेगांव, मुम्बई , श्रीमान बाबुलालजी ताराचंदजी कोठारी लुणावा डिलाई रोड, मुबई  साथ मे  भैरव उपासक श्रीमान बाबुलालजी ताराचंदजी चौहान, लुणावा,  श्रीराम गल्ली, वर्ली  ( वर्ली दरबार)में कार्यक्रम आयोजन किया था । और देखिए हाजरा हजूर पार्श्व भैरव देव का चमत्कार और सिर्फ 15 दिन में सरकार ने अध्यादेश वापिस लिया था ।

    कारण चाहे कुछ भी रहा हो तभी से 
    श्री पार्श्वभैरव भक्ति की प्रथा शुरू हुई और समयान्तरे धीरे धीरे भैरव भक्त जुडते गये ।

    उस समय जिन गीतों की रचना हुई वो गीत आज भी सदाबहार लाजवाब है 
    1- भीड़ पड़े तो वीर पागड़े आइजो रे भैरूजी मन मत भुलजो रे
    2- आवो भैरूजी थे तो पोमणा जिओ राज
    3- आवोजी आवोजी भैरुनाथ वो नाकोडावाले
    4 - देर मत करजो रे भैरु मारा जगत धणी

    साथ ही.....

    नेमीचंदजी यति द्ववारा रचित विक्रम सवंत 2019 को श्री नाकोडा भैरवनाथ की चमत्कारिक स्तुति

    सन 1988 वर्ष में खतरगच्छ के परम पूज्य (वर्तमान) गच्छाघिपति आचार्य श्री मणिप्रभसागरसूरीश्वरजी महाराज साहेब के शुभ हाथों से श्री नाकोडा भैरव चालीसा लिखा गया था. 

    सन 1989 वर्ष में तपागच्छ  के राष्ट्रसन्त आचार्य श्री चन्द्रानन सागर सूरीश्वरजी महाराज साहेब के शुभ मंगल हाथों लिखा गया था उस समय से लेकर आज तक श्री कोडा भैरव चालीसा से कईअदभूत चमत्कार हुए।*


    साथ एक विशेषता यह भी बिना पार्श्व इकतीसा भैरव चालिसा  करना अधूरा होता है इसका मूल कारण यह है श्री नाकोडा भैरुदेव श्री नाकोडा पार्श्वनाथ भगवान के बिना अधूरे है भैरुदेव श्री पार्श्वनाथ भगवान के उपासक है 

    साथ ही एक बात सविशेष पार्श्वनाथ भगवान वितरागी देव है उनसे आपको वितरागता मिलती है किंतु आपको फल तो नाकोड़ा  भैरव देव ही दे सकते है।प्रत्यक्ष  को प्रमाण  की आवश्यकता नहीं  होती।


    इन सबका श्रेय उपरोक्त  सभी को तो जाता ही है किंतु आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय  
    नाकोड़ा दरबार (मंडल) लालबाग, मुम्बई के अध्यक्ष श्री मनोजजी शोभावत के योगदान को भी नजरअंदाज नही किया जा सकता है।
    मनोजजी शोभावत जो स्वयं पार्श्वभैरव देव के परम उपासक है और भैरुदादा के चमत्कारों के प्रत्यक्ष अनुभवी भी।

    आपश्री  ने जब से नाकोड़ा दरबार (मंडल) लालबाग, मुम्बई की स्थापना सन 2001में की है  तब से आज तक लगातार कई पार्श्वभैरव भक्ति के आयोजनों ने सोने पे हागा का कार्य किया है।भैरव भक्तों को नाकोड़ा जी तिर्थ से जोडने मे पुल का कार्य किया है और कर रहे है
    आज नाकोड़ा दरबार एक ब्रांड एम्बेसेडर बन कर उभरा है ।

    माहसुद तेरस को स्थापना दिवस श्री नाकोड़ाजी तिर्थ मे नाकोड़ा दरबार (मंडल)लालबाग,मुम्बई के तत्वावधान मे अत्यंत ही भव्यातिभव्य श्री पार्श्व भैरव महाभक्ति रूप में मनाया जाता है।

    आज आलम ये है कि नाकोड़ा पार्श्वभैरव के प्रति आस्था और चमत्कारों के चलते जगह जगह  श्रीपार्श्व भैरवभक्ति व पार्श्व  इकतीसा भैरव चालीसा के कार्यक्रम जगह जगह आयोजित किये जाने लगे है।

    अंततः यहीं कहूँगी कि -एक बार नाकोडाजी तिर्थ जाकर उस परम पावन परमात्मा नाकोड़ा पार्श्वनाथ दादा एवं भैरूदादा की चरण स्पर्शना करनी ही चाहिए। 

    ये वो तारक तीरथ है।
    जिसकी महिमा अपरम्पार 
    जो जाए नाकोड़ा पार्श्वभैरव द्वार
    उणने मले खुशियों अपार

    जिनाज्ञा विरूध्द कुछ भी लिखा हो तो मिच्छामी दुक्कडम
     संगीता बागरेचा(संगी)
    नोट:-
    पोस्ट में किसी प्रकार का चेंज ना करे ।अदत्तादान का पाप लगता है पोस्ट जैसी है वैसी ही पोस्ट करें 


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