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  • जिन-गुरु अमृत-वाणी   13 October 2017 8:51 AM

    दीपावली कैसे मनायें

    अनादि अनंतकाल से भरतक्षेत्र में अनंत चौबीसी अनंतअनंत काल से होते आये हैं, इसी क्रम में इस युग में भी ऋषभनाथ से लेकर महावीर पर्यन्त चौबीस तीर्थकर हुए । तेइसवें तीर्थकर पार्श्वनाथ के 256 वर्ष साढ़े तीन माह के बाद अन्तिम तीर्थकर भगवान महावीर को कार्तिक सुदी अमावस्या को मोक्ष प्राप्त हुआ था तथा उनके प्रथम गणधर इन्द्रभूति गौतम को अपराण्हिक काल में उसी दिन कैवल्यज्ञान की प्राप्ति हुई थी - इसी के प्रतीकरूप में कार्तिक बदी अमावस्या को दीपावली पर्व मनाया जाता हैं l

    यहां ध्यातव्य है कि भगवान महावीर स्वामी को निर्वाण कार्तिक कृष्ण अमावस्या को प्रभात बेला में हुआ था । तथा उसी दिन शाम को उनके ही शिष्य श्री गौतम गणधर को कैवल्योत्पत्ति हुई थी अतः शाम को घरों में भगवान महावीर को मोक्षोपलब्धि तथा गौतम गणधर को केवल ज्ञान रूपी लक्ष्मी की प्राप्ति के उपलक्ष्य में दीपक जलाकर हर्ष पूर्वक पूजा अर्चना की जाती है l

    मान ले अमावस्या सुबह 10़56 से प्रारम्भ होकर अगले दिन तक है। अन्य धर्मो में तो अमावस्या की रात लक्ष्मी पूजन का विधान है तो वे तो रात का मुहूर्त देखकर ही पूजन करेंगे । किन्तु हमारे भगवान को तो अमावस्या तिथि की प्रभात बेला में मुक्ति प्राप्ति हुई थी तथा उनके मोक्ष गमनोपरान्त सायंकाल में गौतम स्वामी को कैवल्य प्राप्ति के उपलक्ष्य में घरों में दीपक की रोशनी की जायेगी l

    वर्तमान में दीपावली के दिन पूजन कैसे करें इस विषय में भी पर्याप्त मतभेद पाये जाते हैं । यहां दीपावली की पूजन की संक्षिप्त विधि दी जा रही है, आशा है पाठकजन इसे पाकर लाभान्वित होंगे - -

    विधि : प्रातःकाल सूयोर्दय के समय स्नानादि करके पवित्र वस्त्र पहन कर जिनेन्द्र देव के मन्दिर में परिवार के साथ पहुंचकर जिनेन्द्र देव की वन्दना, पूजन करनी चाहिए l

    घर की दीपावली : अपरान्ह काल गोधूली बेला (सायं 4 से 7 बजे तक) में घर के ईशानकोण (उत्तरपूर्व) में अथवा घर के मुख्य कमरे में पूर्व की दीवार अथवा सुविधानुसार दीवाल पर माण्डना (श्री, श्री, वाला) बनाकर चौकी के ऊपर जिनवाणी एवं भगवान महावीर स्वामी की तस्वीर रखनी चाहिए । अन्य देवीदेवताओं ( यथा सरस्वती, लक्ष्मी, गणेशजी आदि की ) के चित्रादि नहीं रखना चाहिए, क्योंकि जैन दशर्न में इसका कोई उल्लेख नहीं हैं । घर के मुखिया अथवा किसी अन्य सदस्य को एवं सभी सदस्यों को शुद्ध वस्त्र पहिनकर दीपमालिका के बायी तरफ आसन लगाकर बैठना चाहिए तथा सामने वाली चौकी पर सोलह दीपक जो कि सोलहकारण भावना के प्रतीक हैं ( इन्हीं सोलहकारण भावनाओं को भाकर तीर्थकर प्रकृति का बन्ध भगवान महावीर स्वामी ने किया था इसी के प्रतीक स्वरूप सोलह दीपक चारचार बातियों वाले जलाए जाते हैं। (16 ग 4 64) यह 64 का अंक चौसठ ऋद्धि का प्रतीक हैं। भगवान महावीर चौसठ ऋद्धियों से युक्त थे इन्हीं के प्रतीक स्वरूप यह चौसठ ज्योति जलायी जाती हैं । अतः सोलह दीपक चौसठ बातियों से जलाकर दीपकों में शुद्ध देशी घी उपयुक्त होता हैं घृत की अनुपलब्धि पर यथायोग्य तेलादि का प्रयोग किया जा सकता हैं । पश्चात दीपावली पूजन - सरस्वती का अष्ट द्रव्य से पूजन करें । पूजन से पूर्व तिलक एवं मोली बंन्धन सभी को करना चाहिए l

    दुकान पर पूजन : इसी प्रकार दुकान पर भी पूजन करना चाहिए अथवा लघुरूप में पंचपरमेष्ठी के प्रतीकरूप पाँच दीपक जलाकर पूजन करना चाहिए l

    पूजन विसर्जन : शांति पाठ एवं विसर्जन करके तदोपरान्त घर का एक व्यक्ति अथवा बारीबारी सभी व्यक्ति मुख्य दीपक को अखण्ड जलाते हुए रात भर णमोकार मंत्र का जाप अथवा बारीबारी सभी व्यक्ति मुख्य दीपक को अखण्ड जलाते हुए रात भर णमोकार मंत्र जाप अथवा पाठ या भक्तामर आदि पाठ करते हुए व्यक्ति अनुसार रात्रि जागरण करना चाहिए । यदि रात्रि जागरण नहीं कर सके तो कम से कम मुख्य दीपक में यथा योग्य घृत भरकर उसे जाली से ढ़ककर उसी स्थान पर रात भर जलने देना चाहिए । मिष्ठान्न आदि का वितरण करना है तो पूजा समाप्ति के पश्चात पूजन स्थल से थोड़ा दूर हटकर वितरित कर सकते हैं l

    नोट : दीपावली के दिन पटाखे बिल्कुल न छुडावें । इससे लाखों जीवों का घात होता हैं पर्यावरण दूषित होता है। स्वयं को भी हानि हो जाती है और भारी पाप का बन्ध होता है। अतः अपने बच्चों को इस बुरी आदत से रोकें l

    सौजन्य : श्रीमती सुशीलाजी पाटनी, मदनगंज (राज़)


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