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  • देवलोक जिनालय पालिताणा    09 September 2017 9:57 AM

    जैन आलु (बटेटा) जैन प्याज़ ( कांदा )

    आजकल एक गुजराती चैनल ने गुजरात के एक खेदुत के खेत के विडियो दर्शय बता कर इस प्रकार का ग़लत प्रचार कर रहे है कि जो आलु ज़मीन के अन्दर होता है ( जैन दर्शन के अनुसार जमीनकंद की श्रेणी मे आता है जिसमें असंख्य जीव होते है ) वह पैड के उपरी भाग मे हो रहे है जिसे जैन बटेटा के नाम से बताया जा रहा है , और जैन लोग इसका उपयोग कर सकते है । अब इस प्रकार की खेती के तरीक़े को समझते है । 
                   कुछ वर्षों पहले फल , फ़ुल व सब्ज़ियों के पेड़ों का प्रदर्शन हुआ था । जिसे देखने के लिए जाना हुआ साथ मे छोटा बच्चा भी था ।  
                   एक जगह काफ़ी लोग एकत्रित हुए थे वहाँ पर जैन प्याज़ ( कांदा) के पेड़ को लाया गया था । यह पेड़ सबको अजुबा लग रहा था , क्योंकि पेड़ पर प्याज़ लगा हुआ था सभी लोग के मन मे एक ही जिज्ञासा कि प्याज़ ज़मीन के निचे होता है और उन्होंने पेड़ के ऊपर कैसे विकसीत किया ? वहाँ पर भी इसको जैन प्याज़ के नाम से विज्ञापन किया जा रहा था । साथ मे रहे छोटे बच्चे ने सब देखकर मुझसे सवाल किया अब तो हम भी इसे खा पायेंगे क्योंकि अब तो यह ज़मीन के निचे नहीं हो रहा है तो जमीनकंद कैसा ? खाने मे पाप भी नहीं लगेगा । 
                       छोटे बच्चे ने सवाल एेसा किया की उसका तुरंत उत्तर देना मुश्किल लगा । कुछ ही दिनों पश्चात परम पूज्य सिद्धांत दिवाकर गच्छाघिपती आचार्य श्री जयघोषसूरिश्र्वरजी महाराजा के पास मे वंदन हेतु जाना हुआ । मन की जिज्ञासा हेतु जैन प्याज़ के बारे मे आप को बताया । पुरी बात सुनने के बाद पूज्श्री ने सचोट जवाब देते हुए कहा कि दो अलग अलग पेड़ों को आपस मे जोड़कर नयी प्रजाती का पौधा वैज्ञानिक प्रयोगशाला मे तैयार किया गया है -
    जिसमें प्याज़ व अन्य पौधा जिसके फल ऊपर पाये जाते है उससे यह नयी प्याज़ की जाती विकसित की है । आगे बताते हुए कहा कि इस प्रकार की नयी जातियों के तैयार करने मे प्याज़ व आलु के मुलगुण वही रहते है और जैनों के लिए बिल्कुल निषेध करने योग्य है । खाने मे दोष वही लगता है जैसे जमीनकंद मे लगता है । 

          यह जानकारी आप सभी लोगों तक पहुँचाए जिससे जाने अनजाने मे जैन समाज इसका उपयोग करना शुरू न करे । 
            देवलोक जिनालय पालिताणा टीम की तरफ़ से जैन आज्ञणा के कुछ भी विरूद्ध लिखा हो तो मिच्छामि दुक्कडम् । 


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