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  • Light of Universe - Jainism.   16 June 2017 8:08 AM

    धूप पूजा

    धूप पूजा करते समय यह भावना रखनी चाहिए कि है प्रभू जेसे धूर्मसेर ऊपर जा रही है एसे में भी ऊध्वगति पाम कर सिध्द शिला पर पहुंचू है प्रभू मेरे अंतर के अष्ट कर्म जल कर खाक हो जाय और मेरे मिथ्यात्व सर्वथा विनाश हो जार विनय धर नामक राजकुमार था ज्योतिष के कथन से राजा ने ऊसे वन में छोड दिया एक सार्थवाह ने ऊसे बडा किया गूरू वाणी सूनकर वो रोज प्रभू की धूप पूजा करने लगा एकदा जहां तक धूप चालू हो तब तक ध्यान मे खडा रहने का सक्लप कर खडा रहा इससे प्रसन्न होकर देव ने विषहर मणी दीया यह मणी से सर्प दंश से राजकुमारी को जीवन दीया प्रसन्न होकर राजा ने राजकुमारी के साथ ऊसका विवाह कर आधा राज दिया एकदा ऊसे के पिता ने ऊसे के राजर पे जढाइ की देव ने आकर पिता पुत्र का सबंध बताया यह सुनकर दीक्षा लि चारित्र् पालन करके सदगति मे गये और मोक्ष पद प्राप्त करेंगे धूप पूजा परमात्मा की बायीं ओर ( यानि अपनी दायीं ओर ) खड़े रहकर धूप प्रज्वलित कर धूप पूजा करते हैं । ध्यान घटा प्रगटावीए वाम नयन जिन धूप मिच्छत्त दुर्गन्ध दूरे टले प्रगटे आत्म स्वरुप हे प्रभु ! जिस तरह धूप प्रकटाने से अंगारे जलकर सुगन्धित धुआं ऊपर जाता है... उसी प्रकार आपकी धुप पूजा करके मेरे ह्रदय में से दुर्गुणों का ढेर राख हो गया है औरसद्गुणों की महक मेरी आत्मा से आएं । धूप को टेढ़ा मेढ़ा रखो , दायें बाएं रखो .. उसका धुँआ हमेशा ऊपर ही ऊपर जाता है । उस प्रकार मैं भी जिस किसी भी हाल में रहूँ , आपकी आराधना करता रहूँ ताकि मैं भी ऊपर ही ऊपर जाऊं और शीघ्र ही मोक्ष पद तक पहुँच सकूँ


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