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  • Priti Shah   13 June 2017 4:12 PM

    सम्यक्त्त्व के पहले भव में श्री पार्श्वनाथ भगवान्

    (Lord Parshwanath) का “जीव (soul)” 
    मरते समय (जीवन के “अंतिम समय”) में
    अपने भाई के प्रति क्रोध को नहीं रोक पाया,
    उसी भाई ने आगे आने वाले 9 भव तक उनके साथ बैर नहीं छोड़ा.
    अंतिम समय में “कमठ” बनकर भी पीछे लगा रहा.
    अगले भव (Next Birth) का “आयुष्य बंध” 
    इस जीवन के “हर तीसरे भाग” (3rd part of this Life)
    में हो सकता है.
    वो भी विशिषत: “पर्व तिथियों” पर.
    यदि कुल उम्र 75 वर्ष की है तो
    25, 50 या 75 वर्ष में आयुष्य बंध होता है.
    यदि ऐसा नहीं भी होता है
    तो जीवन के “अंतिम समय” में
    अगले भव का आयुष्य-बंध होता है.
    इसीलिए “जीवन” के “अंतिम समय” में
    “धर्म-आराधना” या “धर्म श्रवण” बड़ा महत्त्वपूर्ण होता है.
    चूँकि “जीवन” का ठिकाना नहीं
    और हमें ये पता नहीं कि
    हमारे जीवन का “तीसरा” भाग कौनसा है.
    इसलिए रोज कुछ तो धर्म-क्रिया
    या कम से कम “धर्म श्रवण” करना चाहिए.
    कम से कम “अंतिम समय” में
    छठी इंद्रिय (SIXTH SENSE)काम करने लगे.
    विशेष:
    कमठ की तरह आपका अति शत्रु कभी ना कभी आपका “भाई” रहा होगा,
    जरा ये विचार कर लें.


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